‘झड़ी-पानी’

‘सावन के महीने की धूप तो गैंडे की खाल को भी सुखा देती हैं’ यह हमारे पहाड़ की एक प्रचलित कहावत है। अब यहां का दुरुह जन-जीवन इंसानों को तो कतई इजाजत नहीं देता है कि वो खा-खा कर गैंडे जैसे हो जाएं । तब धूप खुद पर कही बात को सिद्ध करती है धान,मडुंवा,झंगोरा,मकई..के खेतों में काम करते स्त्री- पुरुषों की मिट्टी सनी देह में गहराई से उतर उन्हें काला चीकट बनाकर ।
धूप से जलती पीठ के ये वे कठिन दिन हैं जब लगता है कि हवा का ठंडा झोंका कहीं शेष नहीं अब आसपास की दुनिया में। अनवरत बहते पसीने के बीच-बीच में गहरी सांसे लेकर काम में जुटे रहने का इत्मीनान जैसे बारिश शब्द का अस्तित्व मिटाता हुआ सा ! लेकिन फिर कोई पिघल ही जाता है और पसीने की आह की तासीर बादलों को खींच लाती है उनके खेतों की तरफ। और अचानक जोरों की बारिश शुरू ! जो जहां है वहीं किसी पेड़ के नीचे खड़ा हो गया । लेकिन वो ज्यादा देर नहीं ठहर सकते जिन्हें घर जाकर चूल्हा भी सुलगाना है । सो अगर मिल गया कहीं कोई तो केले का लंबा सा पत्ता काट रेनकोट की तरह सर पर धर दाएं-बाएं से भीजता तन लेकर भागे घर की ओर।

कपड़े कहां बहुत जोड़ी धरे हैं बक्स में। तो मोटी-मोटी लकड़ियों से सुलगते चूल्हे के आसपास ही सुखाने को फैला दी ताजा बारिश में भीगी धोती निचोड़ कर।

कभी रुक-रुक कर तो कभी तेज-तेज गिरती बूंदे अपने बने रहने का समय निश्चित करके आई हैं । चार-पांच दिन से पहले नहीं टलने वाली हैं ये बारिश।

चाय का बड़ा सा गिलास थामे खिड़की या दरवाजे से लगी औरतें सुन रही है गाय भैंसों के रंभाने की आवाज।
खाने को सूखा पराल तो भरपूर है। लेकिन फिर भी गौशाला की गर्म गंध से बाहर निकल कर घंटों खुली हवा में जंगल से हरी घास पत्ती न चर पाने के पशुओं के दु:ख के प्रत्युत्तर में अपने-आप से बुदबुदाती हर घर की स्त्रियां दो-चार बार तो दोहराती ही हैं- हे राम ! कब बंद होगा यह ‘झौड़’। क्या बजर पड़ा इस साल इस सरग पर?। जो बरस रहा है तो फिर बरस ही रहा है।

लगातार हो रही जिस बारिश को वो ‘झौड़’ का नाम दे रही हैं असल में वह उनके थके हारे तन के लिए प्रकृति की ओर से आराम का संधान है। जिसमें पानी से भरे खेतों की निराई गुड़ाई के लिए जाने की आवश्यकता क्या ? गीली लकड़ियां जलती नहीं सो जंगल जाने की जरूरत नहीं । अब रही बात दूर नौले या धारे से पानी लाने की तो उसके लिए आसमान से लगातार पानी बरस रहा है। इन भीगे दिनों में खेल या स्कूल के लिए बाहर न जा सकने वाले बच्चों में उछाह जगाने के लिए महिलाएं उन्हें बारिश का पानी इकट्ठा करने के काम में लगा देती हैं। । पत्थर की छत के कोणों से मोटी-मोटी धार जमा करने की होड़ मच जाती है। बड़े लोग बाल्टियां,पतीला,कनस्तर वगैरह भर रहे हैं तो बच्चे पानी की धार के नीचे गिलास,कटोरी का संतुलन बनाने की कोशिश में भीग रहे हैं। उन्हें पता है कि यही पानी पीने के काम आएगा और इसी से खाना बनेगा।

ये बारिश का पानी जैसे अमृत की बूंदें ! उन्हें कहां मालूम कि इन बूंदों की करामात से ही देश का आधा हिस्सा डूबकर रह गया है बाढ़ में।
जल,जमीन,जंगल के काम से फुरसत पाए इन लोगों को देखकर इस वक्त बस इतना ही खयाल आ सकता है कि बारिश हमेशा बहाती ही नहीं है, कैद भी करती है, वर्ष भर श्रम के पसीने में नहाये लोगों के जीवन में आराम के कुछ पलों को ।

— प्रतिभा की कलम से

6 thoughts on “Jhari-Pani: Glimpses of Monsoon Rain in Uttarakhand Hills”

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